दिल्ली की सुबह अभी पूरी तरह जागी नहीं थी। पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर रात की बची हुई ठंड हवा में तैर रही थी। प्लेटफॉर्म पर उतरते ही आस्था ने महसूस किया कि दो दिनों की रेल यात्रा उसके शरीर से कहीं अधिक उसके मन पर चढ़ी हुई थी। आँखों के नीचे हल्की सूजन थी, बालों में सफ़र की धूल अटकी थी और सफ़ेद सूती कुर्ते पर जगह जगह सफ़र की सिलवटें थीं।
उसके कंधे पर एक पुराना बैग था और हाथ में पारदर्शी प्लास्टिक की एक फाइल। फाइल के भीतर उसका एडमिट कार्ड, मार्क शीट, कुछ आवेदन पत्र और वे काग़ज़ थे जिन्हें वह पिछले दो वर्षों से अपनी उम्मीद की तरह सँभालती आई थी। काग़ज़ों के कोने मुड़ चुके थे, कुछ जगह स्याही हल्की पड़ गई थी, लेकिन आस्था उन्हें अब भी ऐसे पकड़े हुए थी जैसे उन काग़ज़ों में उसका भविष्य सुरक्षित रखा हो।
वह कुछ क्षण स्टेशन के बाहर खड़ी रही। सामने दिल्ली की सड़क धीरे धीरे रोशनी पकड़ रही थी। ऑटो रिक्शा वालों की आवाज़ें, चाय की छोटी दुकानों से उठता धुआँ, जल्दी में चलते लोगों के कदम और कहीं दूर से आती किसी बस की भारी आवाज़, सब मिलकर शहर के जागने की सूचना दे रहे थे।
आस्था ने अपनी फाइल पर एक बार फिर नज़र डाली। ‘नीट’। यह तीन अक्षर उसके लिए केवल एक परीक्षा का नाम नहीं थे। पिछले तीन वर्षों की मेहनत, रातों की नींद, पिता की उम्मीद, घर की तंगी और उस घटना की स्मृति, जिसे वह जितना भूलना चाहती थी, उतनी ही गहराई से उसके भीतर धँसती जाती थी, सब कुछ इन्हीं तीन अक्षरों के आसपास घूमता था।
उसने धीरे से साँस छोड़ी।
“पापा, बस थोड़ी दूर है।”
उसके पीछे खड़े रमेश ने उसकी ओर देखा। पचपन वर्ष की उम्र में उनका चेहरा किसी कैलेंडर पर छपे किसान जैसा नहीं, बल्कि उस खेत जैसा लगता था जिसे मौसमों ने बार बार परखा हो। धूप से झुलसी ताँबई त्वचा, आँखों के कोनों पर महीन रेखाएँ, सफ़ेद होने लगी मूँछें और हाथों पर मेहनत की इतनी गहरी लकीरें कि उन्हें देखकर ही खेत की मिट्टी का अनुमान लगाया जा सकता था।
कंधे पर पुराना सफ़ेद गमछा था।
“कितनी दूर है?” उन्होंने पूछा।
“ऑटो वाले ने कहा था, दस मिनट।”
रमेश ने घड़ी देखी। घड़ी पुरानी थी और उसका शीशा एक कोने से खुरचा हुआ था।
“दस मिनट दिल्ली में दस मिनट ही होते हैं न?”
आस्था मुस्कुराई।
“हाँ पापा।”
रमेश ने उसकी मुस्कान को कुछ क्षण देखा। फिर बिना कुछ कहे उसके कंधे से बैग उतारकर अपने कंधे पर रख लिया।
“आप रहने दीजिए।”
“काहे?”
“भारी है।”
“तो क्या हुआ? खेत में इससे भारी बोरी उठाई है।”
“लेकिन आप थके हुए हैं।”
रमेश ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, “बाप अगर बेटी का बैग भी न उठा पाए तो फिर किस काम का बाप?”
आस्था ने कोई जवाब नहीं दिया। वह जानती थी कि उसके पिता ऐसे ही थे। अपने हिस्से का दर्द भी चुपचाप उठाते थे और दूसरों को लगता था कि उनके पास दर्द नाम की कोई चीज़ है ही नहीं।
दोनों टॉलस्टॉय मार्ग की ओर बढ़ गए। जैसे जैसे वे जंतर मंतर के पास पहुँचे, सड़क का चेहरा बदलने लगा। फुटपाथ के किनारे नीले और काले तिरपाल दिखाई देने लगे। कहीं चादरें तह की जा रही थीं, कहीं प्लास्टिक की बोतलें एक तरफ़ जमा की जा रही थीं। कुछ लड़के बांस के डंडों से तिरपाल ठीक कर रहे थे। कुछ लड़कियाँ बड़े भगोनों के पास खड़ी थीं।
सुबह की हवा में अदरक और इलायची की तीखी महक घुली हुई थी।
किसी बड़े पीतल के भगोने में चाय उबल रही थी। भाप ऊपर उठकर ठंडी हवा में घुल रही थी। उसके साथ अदरक की गंध और दूध की हल्की मिठास पूरे शिविर में फैल रही थी। आस्था कुछ कदम आगे बढ़ी और अचानक रुक गई। उसने इतने लोगों को एक साथ देखा।
कुछ के हाथों में फाइलें थीं। कुछ के पास छोटे बैग थे। कई चेहरे ऐसे थे जिन पर रात भर की यात्रा साफ़ दिखाई दे रही थी। कोई मोबाइल पर घर बात कर रहा था, कोई जमीन पर बैठकर चुपचाप चाय पी रहा था। किसी के चेहरे पर गुस्सा था, किसी पर उम्मीद और किसी पर ऐसा खालीपन, जैसे वह बहुत दूर से चलकर आया हो और अब उसे समझ नहीं आ रहा हो कि आगे किस दिशा में जाना है।
आस्था के पैर वहीं ठिठक गए।
“पापा...”
रमेश ने उसकी ओर देखा।
“क्या हुआ बिटिया?”
“क्या हम सही जगह आए हैं?”
रमेश ने चारों तरफ़ देखा। फिर बेटी के कंधे पर हाथ रखा।
“तूने जो पढ़ा, जो सुना, वो सब यहीं तो हो रहा है न, बिटिया। फिर डर काहे का?”
आस्था ने भीड़ की तरफ़ देखा।
“पता नहीं।”
“डर लग रहा है?”
उसने इस बार सिर हिला दिया।
रमेश ने कुछ क्षण चुप रहकर कहा, “डर लगे तो लगने दे। डर का मतलब यह नहीं कि आदमी पीछे हट जाए।”
आस्था ने अपने पिता की तरफ़ देखा।
रमेश ने आगे कहा, “हम खेत में भी बीज डालते समय सब कुछ थोड़े जानते हैं। बारिश होगी कि नहीं, पता नहीं। फसल बचेगी कि नहीं, पता नहीं।
फिर भी बीज डालते हैं।”
आस्था के चेहरे पर बहुत हल्की मुस्कान आई।
“आप हर बात को खेत से जोड़ देते हैं।”
“क्योंकि खेत ने हमको जिंदगी समझाई है।”
दोनों आगे बढ़ गए।
नीम के एक पुराने पेड़ के नीचे एक बूढ़ा आदमी चुपचाप बैठा था। शरीर इतना दुबला था कि कुर्ते के भीतर उसकी हड्डियाँ साफ़ दिखाई देती थीं। सामने एक छोटी सी तख्ती रखी थी। “चुप रहना भी एक सवाल हो सकता है।” वह किसी से बात नहीं कर रहा था। न किसी नारे में शामिल था, न आसपास की हलचल में उसकी कोई रुचि दिखाई देती थी। कोई युवा उसके पास से गुजरता तो वह अपना काँपता हुआ हाथ उठाकर उसके सिर पर रख देता। कभी किसी के कंधे पर हाथ रख देता। फिर उसी तरह चुप बैठ जाता।
आस्था कुछ देर उसे देखती रही।
“पापा, ये सत्यपाल दोर्जे हैं शायद।”
“कौन?”
“मैंने इन्हें टीवी पर देखा था। बहुत पहले किसी आंदोलन में। सुना था कि पढ़ाते भी थे। आपको पता है पापा मैंने सुना है ये काफी वक्त से मौन है।”
रमेश ने बूढ़े आदमी को ध्यान से देखा।
“मतलब बोलते नहीं हैं क्या?”
“हाँ, ऐसा ही सुना है।”
रमेश कुछ क्षण चुप रहे।
“अच्छा है।”
आस्था ने हैरानी से पूछा, “इसमें अच्छा क्या है?”
रमेश ने धीरे से कहा, “कभी कभी आदमी बहुत कुछ बोलकर भी कुछ नहीं कह पाता। और कभी चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाता है।”
आस्था फिर उस बूढ़े आदमी की ओर देखने लगी। उसकी आँखें बंद थीं।
लेकिन चेहरे पर ऐसी स्थिरता थी, जैसे आसपास की हर आवाज़ उसके भीतर कहीं जाकर ठहर जाती हो।
तभी मंच की ओर से किसी माइक की आवाज़ आई। “सभी नए साथियों से अनुरोध है कि अपना नाम रजिस्टर में दर्ज करा दें। पानी और चाय की व्यवस्था बाईं ओर है।”
लोगों के बीच से एक दुबला पतला युवक तेजी से उनकी ओर आया। उम्र बत्तीस साल, नाम अभय साल्वे। दिल्ली में वकालत करता था और पिछले सात- आठ वर्षों से शिक्षा और छात्रों से जुड़े मामलों में काम कर रहा था। गलत रिजल्ट, कोचिंग की ठगी, परीक्षा में गड़बड़ी और छात्रों के अधिकार इन मामलों में उसका आना-जाना लगा रहता था। कानून की पढ़ाई उसने दिल्ली के किसी बड़े नाम वाले कॉलेज से नहीं, बल्कि एक टियर-2 कॉलेज से की थी। फिर भी पिछले कुछ वर्षों में छात्रों के बीच उसका नाम धीरे-धीरे पहचाना जाने लगा था।
“नमस्ते जी। कहाँ से आए हैं?”
“बिहार से,” रमेश ने कहा।
युवक ने तुरंत हाथ बढ़ाया।
“आइए। पहली बार आए हैं तो पहले आराम कर लीजिए। वहाँ पानी है और चाय भी। रजिस्टर में नाम लिखवा दीजिएगा। कोई परेशानी हो तो मुझे बताइए।”
फिर उसने आस्था की तरफ़ देखा।
“आप छात्रा हैं?”
आस्था ने सिर हिला दिया।
“नीट?”
इस बार भी उसने सिर हिला दिया।
युवक ने उसकी आँखों में कुछ पढ़ने की कोशिश की।
“नाम?”
“आस्था।”
“अच्छा। मैं साल्वे।”
उसने डायरी के बीच से एक पन्ना निकाला और कुछ लिखते हुए कहा, “आप चिंता मत कीजिए। यहाँ जितने लोग हैं, सबकी अपनी अपनी कहानी है।
आपकी भी होगी। लेकिन अभी सबसे ज़रूरी है कि आप आराम करें।”
आस्था ने पूछा, “सरकार सुनेगी?”
साल्वे ने उसकी तरफ़ देखा। “सुनना और मानना, दोनों अलग चीज़ें हैं।
हम कोशिश करेंगे कि कम से कम उन्हें सुनना पड़े।” उसका मोबाइल फिर बज उठा। “हाँ, बोलिए... नहीं, अभी मत भेजिए... पहले दस्तावेज़ देख लीजिए...”
वह बोलते हुए मंच की तरफ़ चला गया। आस्था उसे जाते हुए देखती रही। मंच के पास पहुँचते ही उसने किसी स्वयंसेवक के साथ तारों की उलझन सुलझानी शुरू कर दी।
वहीं दूसरी तरफ़ एक युवा लड़की जमीन पर बैठी थी। उसके सामने तख्ती रखी थी। “न्याय मिलने तक अनशन जारी रहेगा।” उसका चेहरा थका हुआ था लेकिन आँखें असाधारण रूप से स्थिर थीं। उसके पास दो और छात्राएँ बैठी थीं।
एक स्वयंसेवक पानी का गिलास लेकर आया।
“आयशा, थोड़ा पानी पी लो।”
आयशा ने हाथ उठाकर मना कर दिया।
“अभी नहीं।”
“सुबह से कुछ नहीं लिया है।”
आयशा के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“पता है। पेट याद दिलाता रहा है।”
स्वयंसेवक ने चिंता से उसकी ओर देखा।
“तबियत बिगड़ जाएगी।”
आयशा ने सामने देखे बिना कहा, “तबियत पहले से बिगड़ी हुई है।
जिनकी परीक्षा और भविष्य बिगाड़ दिया गया है, उनकी तबियत पूछने कोई नहीं आया।” वह एक क्षण रुकी। “अजीब बात है। भूख हमें लग रही है, बेचैनी उन्हें हो रही है।”
स्वयंसेवक चुप हो गया। उसने गिलास नीचे रख दिया।
आयशा की बगल में बैठी छात्रा ने धीरे से उसका हाथ पकड़ लिया। “कम से कम पानी तो पी लो।”
आयशा ने उसकी ओर देखा। “जब तक और लोग हमारे साथ नहीं बैठेंगे मैं अकेले पानी नहीं पिऊँगी।”
आस्था दूर खड़ी यह सब सुन रही थी। उसने पहली बार आयशा को ध्यान से देखा। इतनी कम उम्र में कोई अपने शरीर को इस तरह दाँव पर कैसे लगा सकता है? उसके भीतर अचानक एक अजीब सा प्रश्न उठा। क्या अन्याय इतना बड़ा हो सकता है कि आदमी अपनी भूख-प्यास तक से लड़ने लगे? वह जवाब नहीं खोज पाई।
तभी बड़े भगोने से चाय की भाप उठी और उसके बीच से एक लड़की स्टील का गिलास लेकर रमेश की ओर आई। “अंकल, पहले पानी पी लीजिए।
चाय थोड़ी देर बाद। बहुत गरम है।”
“बेटी, रहने दो।”
“नहीं अंकल। सफ़र से आए हैं।”
उसके पीछे एक युवक आया और उसने आस्था की तरफ़ बिस्किट का पैकेट बढ़ा दिया। “दीदी, सुबह से कुछ खाया है?”
आस्था ने सिर हिला दिया।
“नहीं।”
“तो फिर यह रखिए।”
“नहीं, रहने दीजिए।”
“यहाँ हम किसी को भूखा नहीं रहने देते।”
उसने पैकेट उसके हाथ में रख दिया।
“खा लीजिए। बाकी बातें बाद में।”
आस्था ने पहली बार उस युवक की ओर ध्यान से देखा। “आपका नाम?”
“रूहान।”
उस लड़की ने मुस्कुराकर कहा, “और मैं हिना।”
रूहान ने हँसते हुए कहा, “इनसे डरिए मत। ये यहाँ की रसोई की मंत्री हैं।”
हिना ने उसे घूरकर देखा। “बहुत बोलते हो।”
“आपके सामने ही तो बोल सकता हूँ।”
हिना ने कुछ कहना चाहा, लेकिन फिर मुस्कुरा दी।
आस्था ने वह मुस्कान देखी। शायद कई दिनों बाद उसे किसी अजनबी चेहरे पर ऐसी सहजता दिखाई दी थी। वह बिस्किट का पैकेट हाथ में लिए खड़ी रही। रमेश ने अपनी बेटी की तरफ़ देखा। उनकी आँखों में एक हल्की राहत उतर आई थी। कम से कम इस शहर में उनकी बेटी पूरी तरह अकेली नहीं थी।
दोपहर तक सूरज तेज़ हो चुका था। नीम की छाँव अब शिविर के लिए किसी कमरे जैसी हो गई थी। लोग उसकी सीमा में सिमटकर बैठ रहे थे। कोई दस्तावेज़ पढ़ रहा था, कोई फोन पर बात कर रहा था, कोई आने वाले छात्रों की सूची बना रहा था।
आस्था ने अपना दुपट्टा जमीन पर बिछाया और बैठ गई। रमेश उसके बगल में पालथी मारकर बैठ गए। कुछ देर तक दोनों चुप रहे। फिर रमेश ने कुर्ते की जेब से इस्पात का एक पुराना डिब्बा निकाला। ढक्कन खुलते ही घर के आम के अचार की खट्टी गंध हवा में फैल गई। भीतर दो सूखी रोटियाँ थीं। “खा ले बिटिया। कल शाम से पेट में दाना नहीं गया।”
आस्था ने रोटियों की तरफ़ देखा।
“आपने खाई?”
“हमने खा ली।”
आस्था जानती थी कि यह झूठ है।
“पापा।”
“क्या?”
“आपने नहीं खाई।”
रमेश ने डिब्बा उसकी तरफ़ बढ़ा दिया।
“हमको भूख नहीं है।”
“मुझे भी नहीं।”
दोनों एक दूसरे को देखते रहे। आख़िर रमेश ने डिब्बा बंद कर दिया। उनके हाथ कुछ क्षण काँपते रहे। उन्होंने गमछे से अपना चेहरा पोंछा।
आस्था ने पूछा, “पापा, आपको डर नहीं लगता?”
रमेश ने सामने सड़क की तरफ़ देखा। “लगता है।”
“फिर भी आए?”
“तू आई है, तो हम कैसे नहीं आते?”
आस्था की आँखें भर आईं।
रमेश ने बात बदलते हुए पूछा, “तुझे याद है, जब तू छोटी थी और खेत में हमारे पीछे पीछे घूमती थी?”
“मुझे याद है। आपको कुछ काम नहीं करने देती थी।”
“हाँ। एक बार गेहूँ की पूरी मेड़ खराब कर दी थी तूने।”
आस्था हँस दी।
रमेश भी मुस्कुराए।
कुछ क्षण के लिए दिल्ली, आंदोलन, परीक्षा और उन तीन वर्षों की बेचैनी सब दूर चली गई। फिर आस्था की नज़र अपनी फाइल पर पड़ी। उसकी मुस्कान धीरे धीरे लौट गई। उस फाइल के भीतर उसके भाई की कोई पुरानी तस्वीर नहीं थी। लेकिन उसकी पूरी जिंदगी की सबसे भारी स्मृति उसी काग़ज़ों के बीच कहीं दबकर बैठी थी। दो साल पहले की वह खबर। पेपर लीक। नीट। और फिर उसके भाई का जाना। उसने फाइल को अपने सीने से लगा लिया। रमेश ने उसकी तरफ़ देखा, लेकिन कुछ नहीं पूछा। वह जानते थे कि कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिन्हें पूछना भी घाव को फिर से खोल देना होता है।
उसी समय सड़क के उस पार पुलिस की एक गाड़ी आकर रुकी। उसके पीछे दूसरी गाड़ी। फिर तीसरी। कुछ जवान नीचे उतरे। लोहे के बैरिकेड सड़क के किनारे रखे जाने लगे। उनकी घिसटने की आवाज़ ने शिविर की हलचल को कुछ क्षण के लिए धीमा कर दिया। लोगों की गर्दनें एक साथ उधर उठीं।
साल्वे तुरंत मंच की तरफ़ से नीचे आया।
“घबराने की जरूरत नहीं है। प्रशासनिक व्यवस्था है। हम अपनी जगह पर शांतिपूर्वक बैठेंगे। कोई कानून नहीं तोड़ेगा।” उसकी आवाज़ में दृढ़ता थी, लेकिन चेहरे पर चिंता साफ़ दिखाई दे रही थी।
रमेश ने बैरिकेड को देखा।
“बिटिया, ये तो कुछ ज्यादा ही सख्ती लग रही है।”
आस्था ने अपनी फाइल दोनों हाथों से पकड़ ली।
“हम कानून तोड़ने नहीं आए हैं, पापा।”
रमेश ने उसकी तरफ़ देखा।
“हाँ।”
कुछ देर बाद उन्होंने धीमे स्वर में कहा, “लेकिन कानून और न्याय एक जगह खड़े नहीं मिलते।”
आस्था चुप रही।
सड़क पर बैरिकेड बढ़ते जा रहे थे। दूर से आती पुलिस की गाड़ियों की आवाज़ अब पहले से अधिक स्पष्ट थी। तभी शिविर के दूसरे छोर पर एक भगवा वस्त्र पहने लंबी दाढ़ी वाला आदमी दिखाई दिया। उसके बाल कंधों तक थे। उम्र का ठीक अनुमान लगाना मुश्किल था। वह धीरे धीरे चलता हुआ आया और बिना किसी से कुछ पूछे खाली पड़े बड़े भगोने को उठाने लगा।
हिना ने उसे देखा। “महाराज, रहने दीजिए। हम कर लेंगे।”
उसने शांत स्वर में कहा, “काम में हाथ लग जाए तो मन कम भटकता है।”
“आपका नाम?”
“दिगंबर शास्त्री।”
वह फिर काम में हाथ बटाने बैठ गया।
हिना उसके पास आकर बैठ गई।
कुछ ही देर में दोनों बिना किसी बातचीत के काम में लग गए।
रूहान चाय लेकर आया।
“बाबा, चाय?”
दिगंबर शास्त्री ने सिर उठाया।
“पहले उस यजमान को दे आओ। सफ़र से आए हैं।”
रूहान ने चौंककर पूछा, “आप उन्हें जानते हैं?”
दिगंबर ने उसकी ओर देखा और बहुत सहजता से कहा, “अभी तो देखा है। थकान चेहरा बता देता है।”
रूहान कुछ क्षण उसे देखता रहा। फिर चाय लेकर रमेश की ओर चला गया। दिगंबर शास्त्री ने अपना सिर झुका लिया और काम करता रहा। उसकी उँगलियाँ बहुत स्थिर थीं।
शिविर में लोग आते रहे। नारे लगते रहे। किसी को पुलिस के बढ़ते बैरिकेड की चिंता थी, किसी को राशन की, किसी को अदालत की अगली सुनवाई की और किसी को इस बात की कि उसके गाँव से आने वाली ट्रेन समय पर पहुँचेगी या नहीं। हर किसी के पास अपनी एक चिंता थी। हर किसी के भीतर कोई न कोई अधूरी कहानी थी।
आस्था ने पहली बार महसूस किया कि शायद यही इस आंदोलन की सबसे बड़ी सच्चाई थी। यहाँ कोई अकेला मुद्दा लेकर नहीं आया था। कोई अपने भविष्य के लिए बैठा था, कोई अपनी खोई हुई जमीन के लिए, कोई अपने बेटे की स्मृति के लिए, कोई अपने साथी के अधिकार के लिए और कोई उस व्यवस्था से जवाब माँगने आया था जिसने उसकी वर्षों की मेहनत को एक काग़ज़ की गलती समझ लिया था।
शाम अभी दूर थी। लेकिन दिल्ली की धूप ढलने से पहले ही हवा में तनाव उतर आया था। आस्था ने नीम की छाँव से सामने खड़े सम्राट यंत्र की लाल दीवारों की तरफ़ देखा। फिर अपनी फाइल सीने से लगाई और पिता के पास बैठ गई। रमेश ने बिना कुछ कहे उसका हाथ पकड़ लिया। आस्था ने उनकी तरफ़ देखा। कुछ कहने की जरूरत नहीं थी। वह वहीं बैठी रही।